Thursday, July 17, 2008

विलासिता का दुख (the sorrow of luxury)

courtesy : Arvind Saaraswat

http://www.hindinest.com/vyang/v19.htm


विलासिता का दुख

जब कभी भी किसी विकसित देश में उपलब्ध आम जनसुविधओं के बारे में सुनता या पढ़ता हूं तो हृदय से हूक उठ जाती है। अब इसका अर्थ आप यह कदापि ग्रहण न करें कि मैं उनकी सुविधा-सम्पन्नता से जल उठता हूं। बिना किसी आत्म प्रवंचना के कहूं तो मुझे यह उनकी विपन्नता ही नजर आती है। सुख-सुविधाओं का जो मायाजाल अपने देश में निहित है वह कहीं ओर कहां हो सकता है। अब आप ही बताइए वो सुविधा किस काम की जो आप को बांध कर ही रख दे। सुना है अमेरिका में बिजली कटौती न के बराबर है। यदि ऐसा है तो वहां के घरों में रहने वाले लोग इक्का-दुक्का मौकों पर ही एक-साथ घर से बाहर निकलते होंगे। अब अपने यहां देखिए दिन में दसियों घंटों तक तो बिजली गुल रहती है, बिजली होती भी है तो जल देवता नदारद मिलते हैं। इन दोनों ही अवसरों पर जमावड़ा चौक पर होता है। दिन में 24 घंटों में से 16 घंटे तक रौनक घर के बाहर ही होती है और ऐसे अवसरों पर जो मुख और श्रवण सुख मनुष्येन्द्रियों को प्राप्त होता है, वह भला उन पाश्चात्य देशों में रहने वाले लोगों को कहा मिलता होगा। अपने यहां की महिलाएं एवं पुरुष दोनों ही इस अवसर का लाभ अपने दिल की भड़ास निकालने के लिए बखूबी करते हैं। दूसरों की बुराइयां करने में जो सुख मिलता है वो भला 5 सितारा होटलों में अब बताइएं यह किस काम की विकसिता। ट्रेफिक नियमों के संबंध में भी वहां फैली विषयता झलकती है। बी.एम.डब्ल्यू, मर्सिडीज आदि जैसी अनेक हाई क्लास भारी-भरकम गाड़ियां भी अदनी-सी रेड लाइट के इशारे पर नाचती हैं, अपने यहां तो लखटकिया वाली छकड़ा गाड़ी भी काले धुंए का गुबार उड़ाती हुई फर्राटे से ट्रैफिक नियमों को धत्ता बताकर रख देती है। बड़ी-बड़ी गाड़ीवालों का तो कहना ही क्या! वो तो जब तक जी चाहा रोड पर, नहीं तो फुटपाथ पर दौड़ पड़ती हैं विदेशों में मॉडर्न ऑर्ट की मांग बहुत हो, परन्तु वहां पर इस कार्य के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता। अपने यहां तो लोग मुंह में कूची लेकर घूमते रहते हैं। जहां दिल किया पच्च... पिचकारी मारी और दीवार पर मॉडर्न ऑर्ट तैयार। जबकि विदेशों में तो सड़क पर थूकने पर ही जुर्माने का प्रावधान है। अब आप ही बताइए यह कहा का इंसाफ है कि मनुश्य को सोने के पिंजरे में कैद करके रखा जाए। संभवत: यह सारी कमियां वहां के प्रशासन की देन है। हम अपने विकास के पाषाणयुग को भी नहीं भूलते बल्कि उसका यदा-कदा प्रदर्शन सांसद में कर उसका सीध प्रसारण देश भर में करवा देते हैं ताकि हमारी वास्तविक पहचान छोटे-छोटे बच्चों तक के हृदय में स्थायी बनी रहे। हम अपनी शारीरिक क्षमता एवं धाराप्रवाह बोलने की दक्षता का सटीक अवलोकन संसद में माइक, कुर्सी, मेज तोड़कर तथा धरने के दौरान चीख-पुकार कर दर्शा देते हैं। हमारे मन में जब भी भड़ास उत्पन्न होती है, तो उसे सरकारी वस्तुओं यथा बस, ट्रेन के शीशे, खंभे, ग्रिलों आदि पर इत्मीनान से निकाल देते हैं। अब आप ही कहें, ऐसा क्या वहां संभव है। वहां के लोग घरों के अंदर दुबक कर सोते हैं। अपने यहां तो आम आदमी रात को चने चबाकर पानी का घूंट मारकर तसल्ली से ग्रहों से विचार-विमर्श कर सोता है। वहां पर लोग विकेंड सिस्टम से चलते हैं परन्तु अपने सरकारी कर्मचारी तो कार्यालय में रहकर भी विकेंड मनाते हैं। ऐसी विसंगतियों के चलते यदि वह यह भ्रम मन में पाल कर बैठें हैं कि वह विकसित है, तो मैं इस पर सिर्फ खिसयानी हंसी ही हंस सकता हूं।

अरविन्द सारस्वत

Academy award winning short animated film

This is from pixar.

video

Really a master peice of art.


Look at the image and follow the instructions and you will get to see something really good. If you figure it out what you see,then do tell me.

Wednesday, July 16, 2008

Lolzzz..... ;)

Courtesy: http://presurfer.blogspot.com/2008/05/mans-best-friend.html


Thursday, July 10, 2008

A few wonderful lines came across.

Teri doli uthi,

Meri mayyat uthi,

Phool tujh par bhi barse,

Phool mujh par bhi barse,

FARQ SIRF ITNA SA THA,

Tu saj gayi,

Mujhe sajaya gaya ,

Tu bhi ghar ko chali,

Main bi ghar ko chala,

FARQ SIRF ITNA SA THA,

Tu uth ke gayi,

Mujhe uthaya gaya ,

Mehfil wahan bhi thi,

Log yahan bhi the,

FARQ SIRF ITNA SA THA,

Unka hasna wahan,

Inka rona yahan,

Qazi udhar bhi tha, Molvi idhar bhi tha,

Do bol tere pade, Do bol mere pade,

Tera nikah pada, Mera janaaza pada,

FARQ SIRF ITNA SA THA,

Tujhe apnaya gaya ,

Mujhe dafnaya gaya...


Sunday, July 6, 2008

A tribute to Late Sri Harivansh Rai Bachchhan

This one I composed long back on 2nd feb 2003,after the sad demise of Sri Harivansh Rai Bachchhan. Though,I hadnt even read much of his composed literature by then,but I knew how great he was.I know its not very good..(or may be not even good enough),but that was just the beginning of my writings....
वो थे कितने महान,
पाया उन्होंने कितना सम्मान,
कमाया सहित्य में कितना नाम,
शायद ज़रूरत थी इश्वर को उनकी,
बुला लिया उन्हें बैकुंठ धाम ।।
उनकी कविताओं के मुख्य विषय
थे उल्लास मस्ती और आनंद,
थी ऐसी उनकी कवितायें,
प्रफ़ुल्लित हो मन मंद-मंद।।
थे मस्त दीवाने और आशवादी,
रचित करी मधुबाला मधुशाला।
प्रसन्न और आनंदित रहकर
पीते थे मस्ती का प्याला।।
चले गये छोड़कर अपनी यादें,
चलो याद करें हम उन्हें आज।
उनकी कविताओं का रंग बढ़ा दें
भरकर उनमें संगीत साज़।।
ईश्वर ने उन्हे बुलाया है,
उनकी मदमस्त कवितायें सुनना चाहा होगा।
उनकी मादक कवितायें सुनकर स्वयं
ईश्वर ने मस्त सपने बुनना चाहा होगा।।

Friday, July 4, 2008

To all Hindi lovers

I have been in Love with Hindi for so long.
Though,only recently I have started reading hindi novels as well.
The first one I finished was Nirmala by Premchand.
I would strongly recommend it to everyone who is interested in reading hindi.
Its a very good novel and written so beautifully that you can live it.
I have its .doc format. Anyone interested,please contact me.
Cheers
Manu

Rich Dad Poor Dad

Its a wonderful book by Robert Kiyoski emphasising on Financial Intelligence.
I have the eBook. So far its one of the best books I have read. You can read info on wikipedia.
If any one needs it, feel free to contact me and I shall mail you the ebook.
Enjoy..........
Cheersss.
Manu