Wednesday, February 27, 2008

A poem from "Maithili Sharan Gupt"

a few very famous lines by मैथिलि शरण गुप्त
चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी माला में बिध प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ
चाह नहीं देवों के सर पर चढ़ भाग्य पर इठलाऊँ
मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पर जायें वीर अनेक

2 comments:

lonely warrior said...

nice,.,.i have read it,.its touchin,.,.keep up d gud work,.

Parthiv said...

Hi! Manu,

I am very sorry to say that these lines are not created by Maithili sharan ji gupta..... these are by Shri makhan lal chaturvedi.....please don't take this otherwise....

Thanks